आध्यात्मिक जीवन इस तरह जियें
इस जीवन के बाद मनुष्य का एक और भी जीवन है, जो कि इस जीवन से लाखों-करोड़ों गुना लंबा है। कितने वर्षों, युगों और कल्पों तक वह जीवन चलता है, इसका अनुमान संभव नहीं है। वह एक प्रकार से अपनी अपरिमित अवधि के कारण अनंत और अमर ही कहा जा सकता है। उसे पारलौकिक जीवन कहा गया है।
पारलौकिक जीवन के विश्वास में संदेह की गुंजायश अब नहीं रह गई। आज का विज्ञान भी मनुष्य की रहस्यों को खोजता हुआ, कुछ ऐसे निष्कर्ष पर पहुंच रहा है, जिसमें पारलौकिक जीवन के प्रमाण मिले हैं। किंतु भारतीय ऋषि-मुनियों ने तो अपनी साधना, अपने ज्ञान और अपनी तपस्या के आधार पर इसका बहुत पहले पता लगाकर घोषणा कर दी थी और सारा भारतीय जीवन उसको ही लक्ष्य मानकर, उसको ही दृष्टि में रखकर निर्धारित किया गया है। पारलौकिक जीवन को अदृष्टिगोचर रखकर लौकिक जीवन नहीं जिया जा सकता और जो ऐसा करते हैं, अनियोजित तथा अबूझ जीवन जीते हैं, वे धोखा खाते हैं और अपने उस अनंतावधि जीवन के लिए काँटे बो लेते हैं।
लौकिक जीवन पारलौकिक जीवन की तैयारी का अवसर है। इसको ही यथार्थ अथवा अंतिम जीवन मान लेना भारी भूल है। मनुष्य यहाँ इस जीवन में जो कुछ पाप-पुण्य, दुःख-सुख, भलाई-बुराई, स्वार्थ-परमार्थ संचय करता है, वही उसके साथ जाकर उस पारलौकिक जीवन में फलित तथा प्रस्फुटित होता और उसी के अनुरूप जीवन अनंतकाल तक सुख-दुःख अथवा स्वर्ग-नरक भोग करता है। वर्तमान जीवन अनागत जीवन की तैयारी का एक ही अवसर है। इस तथ्य को कभी न भूलना चाहिए और उसको सुखद तथा संतोषप्रद बनाने के लिए, यहीं अभी से तैयारी कर लेनी चाहिए।
जीव का जागतिक जीवन अविश्वसनीय तथा नश्वर है। इसे नष्ट तो होना ही है, पर साथ ही यह भी पता नहीं कि यह सौ वर्ष तक जायेगा या इसी क्षण अथवा अगले क्षण छूट जायेगा। इस नश्वरता और क्षणिकता के प्रमाण बनकर न जाने कितने ही अकस्मात् मरने वाले आँखों और कानों के सामने से गुजरते रहते हैं। सोते हुए, खाते हुए, पीते हुए, हँसते हुए, बोलते हुए, खेलते और काम करते हुए, न जाने कितने जीव नित्य ही इहलीला समाप्त कर अपने दीर्घकालीन पारलौकिक जीवन में प्रवेश करने और यहाँ का लेखा-जोखा भोगने के लिए चल देते हैं। बेटा बैठा रहता है, पत्नी खड़ी रहती हैं, संबंधी देखते रहते हैं, संपत्ति और संचय पड़ा रहता है, पर आवाज लगते ही पंछी पूरी-अधूरी योजनायें, कार्यक्रम, बातचीत और व्यवहार-बर्ताव सब कुछ छोड़कर उड़ जाता है।
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